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जैसी करनी वैसी भरनी

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कांग्रेस पार्टी - देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल जो किसी समय 415 लोकसभा सीटों के साथ सत्ता पर काबिज़ हुआ था। आज पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में देश की सबसे पुरानी पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। राजनीति को जानने और समझने वालों के लिए यह अचंभित करने वाली बात कतई नहीं है। इन नतीजों में उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की लॉन्चिंग से पहले ही प्लेन क्रैश समान राजनीतिक शुरुआत हुई, तो वहीं पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे व्यक्तित्व के अपमान को जनता ने ज़ोरदार तमाचा दिया और खुद को राजनीतिक स्वयंभू समझने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को करारी हार का सामना करना पड़ा।  असलल में कांग्रेस पार्टी में बुजुर्गों के अपमान की कहानी सन 1970 में शुरू हुई थी जब इंदिरा गांधी ने सिंडिकेट के बड़े चेहरों, जिनमें के. कामराज से लेकर अतुल्य घोष और मोरारजी देसाई जैसे ईमानदार और स्पष्टवादी व्यक्तित्व तक का बुरी तरह अपमान कर दिया गया और सत्ता के घमंड में चूर तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रातों रात मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय छीन कर उन्हें कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर कर दिया। कुछ यही कहानी कैप्...

किस तरह कांग्रेस के ही पदचिह्नों पर चलकर कांग्रेस को निप्टा रही मोदी-शाह की जोड़ी, और राहुल के "अपने तरीके" ने डुबा दी पार्टी की नैया।

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पूर्व प्रधानमंत्री श्री पीवी नरसिम्हा राव, देश की राजनीति में एक एैसा नाम जिनका कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में इस कदर सिक्का चमका कि 1991 में ये प्रधानमंत्री बने। ये वो दौर था जब कांग्रेस में दिल्ली से लेकर राज्य स्तर तक में चतुर रणनीतिज्ञों का बोलबाला था। अर्जुन सिंह, शरद पवार, विद्याचरण शुक्ल, नारायणदत्त तिवारी, प्रणब मुखर्जी, शीला दिक्षित, अशोक गेहलोत और स्वयं नरसिम्हा राव समेत अनेकों चतुर राजनेताओं का कांग्रेस के छोटे से बड़े फैसलों में योगदान हुआ करता था।  मध्यप्रदेश और देश की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को एक चाणक्य के रूप में जाना जाता था। 1984 के लोकसभा चुनावों में ग्वालियर से ऐन वक्त पर श्री अटल बिहारी के सामने महाराज माधवराओ सिंधिया को मैदान में उतार कर अटल को हराने की रणनीति भी अर्जुन सिंह की ही थी। मगर कहा जाता है कि राजनीति के इस चाणक्य को पीवी नरसिम्हा राव ने उलझा कर रख दिया था। अर्जुन सिंह की खासियत थी कि जो पूछा जाता था उसका जवाब हमेश कुछ और ही देते थे, और पार्टी ने इन्हें जहां जहां भेजा वहां वहां इन्होनें जीत का परचम लहरा दिया। वहीं पीवी नरसिम्हा ...

जब भारत ने 63 दिनों में 488 नान स्‍टाप फ्लाइट्स के जरिए 1.70 लाख लोगों को किया था एयरलिफ्ट, गिनीज बुक में दर्ज है ये घटना!

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रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी जंग से वहां मौजूद भारतीयों को सकुशल निकालने की जो समस्‍या आज देश के सामने खड़ी हो रखी है वही समस्‍या एक बार 1990 में भी आई थी। उस वक्‍त एक लाख सत्‍तर हजार लोगों को एयरलिफ्ट किया गया था। एयर इंडिया की यह उपलब्धि अभी भी एक विश्व रिकॉर्ड है, जिसे 13 अगस्त से 11 अक्टूबर, 1990 के बीच अंजाम दिया गया था। उस समय कुवैत में 1,70,000 से ज्यादा भारतीय फंसे हुए थे और उन लोगों को अम्मान से मुंबई लाने के लिए एयर इंडिया के विमानों ने कुल 488 उड़ानें भरीं थी। यह दूरी 4000 किलोमीटर से भी ज्यादा थी। यह अभियान खाड़ी युद्ध के दौरान चलाया गया था, जिसमें कुवैत और इराक में रह रहे भारतीय लोगों को बचाया गया था। रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी भीषण जंग में वहां फंसे भारतीयों को लाना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यूक्रेन से जान बचाने के लिए भारतीय अलग अलग देशों की तरफ रुख कर रहे हैं। वहीं भारत ने भी इन भारतीयों को वापस लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यूक्रेन के पड़ोसी देशों से लगातान विशेष विमानों के जरिए भारतीयों को वापस लाया जा रहा है। सरकार लगातार इनसे संपर्क बन...

कृषि कानूनों की वापसी - सही या ग़लत?

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देश में एक बेहद एैतिहासिक आंदोलन चला, यूपी, पंजाब-हरियाणा की बॉर्डर पर किसान बैठे, 700 से अधिक किसानों ने भी जाने गंवाई, पूरा कि केंद्र सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। मगर जब यह कानून आए थे तब भी, और वापस हुए तब भी, लोग तमाम तर्कों के साथ इन फैसलों को सही और गलत ठहरा रहे हैं। हालांकि आरएलएस का किसान विंग पहले दिन से ही इन कानूनों के विरोध में रहा। भारतीय किसान संघ के महासचिव बद्री नारायण चौधरी ने कहा है कि यह विधेयक उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाला है और इससे किसानों का जीवन और मुश्किल होने वाला है। चौधरी ने कहा कि - भारतीय किसान संघ किसी सुधार के विरोध में नहीं है। पर इन विधेयकों पर किसानों की असल चिंताएं हैं। उन्होंने बताया कि अब जिसके पास भी पैन कार्ड है, वही व्यापारी बन कर सीधा किसान से डील कर सकता है। सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिससे यह तय हो सके कि जब उसका उत्पाद खरीदा जाएगा, उसी वक्त उसे पेमेंट हो जाएगा या फिर सरकार उसके पेमेंट की गारंटर बनेगी। चौधरी ने बताया कि देश के 80 फीसदी किसान छोटे या मध्यम वर्ग के हैं। इसलिए एक भारत-एक बाजार का नारा उनके लिए...

खराब ईवीएम है या फिर कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा?

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देश में जब जब चुनाव होते हैं, ईवीएम का मुद्दा सतह पर आता ही है। ये सिलसिला असल में 2009 में शुरू हुआ था जब केंद्र में भाजपा की हार हुई थी।  उस वक्त मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, और अपने राजनीतिक गुरू श्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ "ईवीएम हटाओ लोकतंत्र बचाओ" का समर्थन किया करते थे। उस समय भाजपा के दिग्गज नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने "Democracy at Risk" नाम से एक किताब भी जारी की, जिसका भाजपा समेत आरएसएस ने सारे देश में प्रचार किया और ये पूछा गया, कि - "जब अमरीका, यूरोप, रशिया जैसे विकसित देश ईवीएम इस्तेमाल नहीं करते तो कांग्रेस की यूपीए सरकार और चुनाव आयोग को इस मशीन से इतना प्रेम क्यों है?" साथ ही तब विपक्ष ने कांग्रेस की बड़ी जीत के पीछे ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया था।  सन 2013 में जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा को श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बाद बड़ी जीत मिली, तब वही ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप कांग्रेस ने भाजपा पर लगा दिया, हालांकि गौर करने वाली बात ये है कि तब केंद...

पंजाब की सियासी हवा किस ओर बह रही है?

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पंजाब! उन राज्यों में शुमार जहां सन 2012 तक, हर 5 वर्षों में सत्ता परिवर्तन की परंपरा चली आई थी। इस परंपरा को तोड़ा शिरोमणि अकाली दल ने, और अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के साथ ही सन् 2012 में सरदार प्रकाश सिंह बादल दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बन गए।  मगर एक बड़ी पुरानी कहावत है, कि  "सांप और मुगालता कभी नहीं पालना चाहिए" राज्य स्तरीय पत्रकारों से अगर बात करो, तो उनका साफ कहना होता है कि बादल साहब के 2012 से 2017 वाले कार्यकाल में भ्रष्टाचार बढ़ गया था, नशा चरम पर जाता जा रहा था, मगर इसके बावजूद सरकार, उसके विधायक और नेता यह कहते दिखाई देते थे कि -  "चाहे जो हो जाए, जट सिख तो अकालियों के पास ही आएगा, और कहां जाएगा"? इस सबके बीच "बरगाड़ी कांड" उस सरकार के लिए ताबूत की कील समान साबित हुआ, और जनता में जो सरकार के खिलाफ अंडरकरंट था वो सतह पर आ गया। 2017 के विधानसभा चुनाव आते आते अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी बढ़ती चली गई और राज्य में 2014 के विधानसभा चुनाव में 4 लोकसभा सीटें जीती आम आदमी पार्टी भी मुकाबले में आ गई।  कांग्रेस की ओर स...

पश्चिम बंगाल - तृणमूल की जीत या भाजपा की हार?

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पश्चिम बंगाल में 2021 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार और तृणमूल कांग्रेस की जीत के राजनीतिक मायने - पिछले वर्ष हुए बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार पर कई बुद्धिजीवी यह तर्क देते रहे कि पिछले चुनावों में भाजपा 3 सीटें जीती थी जो अब 75 पार पहुंच गई है इसलिए यह एक तरह की उपलब्धि है। चलिए ठीक है, दिल बहलाने के लिए गालिब यह ख्याल भी अच्छा है। परिणामों को विस्तार से अगर पढ़ें, तो दो बातें निकल कर सामने आती हैं। पहली तो ये कि इन चुनावों के परिणामों को 2016 के विधानसभा चुनाव से तोल कर देखा ही नहीं जा सकता। और यह बात भाजपा के तमाम रणनीतिकार और प्रवक्ता खुद चुनाव परिणाम सामने आने से पहले तब कह रहे थे जब उनसे यह पूछा जाता था कि आपको तो पिछले बार सिर्फ 3 सीटें मिली थी, 200 पार कैसे जाएंगे? और इस प्रश्न के जवाब में भाजपा के प्रवक्ता यह तर्क दिया करते थे कि -  "2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में 18 लोकसभा सीटों पर जीत प्राप्त हुई थी, और 126 विधानसभा सीटों पर उसे बढ़त प्राप्त थी, इसलिए आप 2016 को भूल जाइए और 2019 पर निगाह डालिए !" अब अगर 2019 के चुनावो...