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महाराष्ट्र: आखिर चाणक्य पवार के दिमाग में क्या चल रहा है?

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महाराष्ट्र की सियासी उठापटकों से सारा देश वाकिफ है। पहले शिवसेना में टूट और अब NCP में टूट के बाद अजित पवार का NDA सरकार में उपमुख्यमंत्री बनना, शरद पवार और भतीजे अजित गुट में एक दूसरे के खिलाफ बयानों की बौछार और अब अचानक से सब कुछ ठंडा पड़ जाना और चाचा-भतीजे समेत दोनों गुटों के नेताओं की बार बार होने वाली मुलाकातें, इस सब से महाराष्ट्र की जनता असमंजस में है। वो जयंत पाटिल जिन्होंने अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे समेत कुछ विधायकों को कुछ दिनों पहले सस्पेंड किया था, और वो सुनील तटकरे जिन्हें जयंत पाटिल की ही तरह अजित गुट ने प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है, ये दोनों ही एक दूसरे पर मुखर रहे और एक दूसरे के गुटों के नेताओं को सस्पेंड करने में व्यस्त थे। मगर, पिछले दिनों इन दोनों नेताओं की सौहार्दपूर्ण मुलाकात हुई और दोनों गुट एक दूसरे के प्रति नरम पड़ गए। हालांकि एक ओर NCP सांसद व शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ये बोल रही हैं कि पवार साहिब INDIA गठबंधन के साथ हैं और किसी कीमत पर BJP से समझौता नहीं करेंगे, मगर इस सबके बीच जो मेल मुलाकातों का दौर जारी है, उससे उद्धव ठाकरे गुट की ...

खराब ईवीएम है या फिर कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा?

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देश में जब जब चुनाव होते हैं, ईवीएम का मुद्दा सतह पर आता ही है। ये सिलसिला असल में 2009 में शुरू हुआ था जब केंद्र में भाजपा की हार हुई थी।  उस वक्त मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, और अपने राजनीतिक गुरू श्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ "ईवीएम हटाओ लोकतंत्र बचाओ" का समर्थन किया करते थे। उस समय भाजपा के दिग्गज नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने "Democracy at Risk" नाम से एक किताब भी जारी की, जिसका भाजपा समेत आरएसएस ने सारे देश में प्रचार किया और ये पूछा गया, कि - "जब अमरीका, यूरोप, रशिया जैसे विकसित देश ईवीएम इस्तेमाल नहीं करते तो कांग्रेस की यूपीए सरकार और चुनाव आयोग को इस मशीन से इतना प्रेम क्यों है?" साथ ही तब विपक्ष ने कांग्रेस की बड़ी जीत के पीछे ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया था।  सन 2013 में जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा को श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बाद बड़ी जीत मिली, तब वही ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप कांग्रेस ने भाजपा पर लगा दिया, हालांकि गौर करने वाली बात ये है कि तब केंद...

पंजाब की सियासी हवा किस ओर बह रही है?

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पंजाब! उन राज्यों में शुमार जहां सन 2012 तक, हर 5 वर्षों में सत्ता परिवर्तन की परंपरा चली आई थी। इस परंपरा को तोड़ा शिरोमणि अकाली दल ने, और अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के साथ ही सन् 2012 में सरदार प्रकाश सिंह बादल दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बन गए।  मगर एक बड़ी पुरानी कहावत है, कि  "सांप और मुगालता कभी नहीं पालना चाहिए" राज्य स्तरीय पत्रकारों से अगर बात करो, तो उनका साफ कहना होता है कि बादल साहब के 2012 से 2017 वाले कार्यकाल में भ्रष्टाचार बढ़ गया था, नशा चरम पर जाता जा रहा था, मगर इसके बावजूद सरकार, उसके विधायक और नेता यह कहते दिखाई देते थे कि -  "चाहे जो हो जाए, जट सिख तो अकालियों के पास ही आएगा, और कहां जाएगा"? इस सबके बीच "बरगाड़ी कांड" उस सरकार के लिए ताबूत की कील समान साबित हुआ, और जनता में जो सरकार के खिलाफ अंडरकरंट था वो सतह पर आ गया। 2017 के विधानसभा चुनाव आते आते अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी बढ़ती चली गई और राज्य में 2014 के विधानसभा चुनाव में 4 लोकसभा सीटें जीती आम आदमी पार्टी भी मुकाबले में आ गई।  कांग्रेस की ओर स...

नाम अलग पर काम वही - संजय गांधी द्वितीय

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 नाम अलग पर काम वही... संजय गांधी द्वितीय! बड़े-बुजुर्गों और वरिष्ठ पत्रकारों से संजय - इंदिरा गांधी की सरकार के बारे में कई बातें सुनी, साथ ही कई किताबें, कई राजनेता जैसे डीपी मिश्र, आर के धवन, अरुण शौरी आदि दिग्गजों के उपन्यास भी पढ़े। इन्हे पढ़ कर लगता था कि काश उस वक्त की वो राजनीति देखने का मौका हमें मिल पाता ! 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस का 352 सीटों पर जीतना, 1975 वाला इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला और देश में रातों-रात इमरजेंसी का लागू हो जाना, 1977 के चुनाव में देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनना और अमेठी से संजय गांधी व रायबरेली से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हारने वाला घटनाक्रम हो, हरियाणा में जनता पार्टी की चौधरी भजन लाल के नेतृत्व वाली पूरी सरकार का रातों रात कांग्रेस में शामिल होना, सिख दंगों के बाद हुए 1984 के लोकसभा के चुनाव हों, 1989 में देश में जनता दल की सरकार का बनना हो, या फिर 1999 में मात्र 1 वोट से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार का गिरना आदि और भी कई छोटे-बड़े घटनाक्रम भारत के राजनीतिक इतिहास में दर्ज हैं ।  जिसमें उत्तर प्रदेश तो ...